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ब्लड नहीं मिलने से थैलेसीमिया पीड़ित 300 बच्चों की जान को खतरा

भोपाल. कोरोना संकट काल ने एक नया संकट खड़ा कर दिया है. ये संकट थैलेसीमिया पीड़ित बच्चों की जिंदगी पर भारी पड़ सकता है. कोरोना के कारण इन पीड़ितों को ब्लड (Blood) हासिल करने में भारी दिक्कत हो रही है. खून के बिना इनकी ज़िंदगी खतरे में पड़ गयी है. भोपाल में कोरोना के बाद अब लोगों को अपने बच्चों को बचाने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है. थैलेसीमिया पीड़ित बच्चों को खून चढ़ाना पड़ता है. लेकिन कोरोना के कारण न तो लोग ब्लड देने के लिए आगे आ रहे हैं और अगर आ भी जाएं तो कोरोना संक्रमित होने के डर से ब्लड ले पाना भी खतरे से खाली नहीं है.

यही नहीं, समय पर ब्लड नहीं मिलने के कारण थैलेसीमिया पीड़ित बच्चों के परिवार वाले बेहद परेशान हैं. ब्लड बैंक में भी खून की कमी है. शासन प्रशासन का फोकस कोरोना पर होने की वजह से किसी ने इस तरफ ध्यान नहीं दिया.

300 बच्चों की ज़िंदगी पर खतरा
थैलेसीमिया से पीड़ित भोपाल और उसके आसपास के जिलों में 300 बच्चे हैं. यह सभी परिवार भोपाल आकर बच्चों को ब्लड चढ़वाते हैं. कुछ दिन से यह परिवार ब्लड बैंक में ब्लड नहीं होने के कारण परेशान हो रहे हैं. उन्हें डोनर भी नहीं मिल रहे हैं. अस्पताल बिना डोनर के उन्हें ब्लड नहीं दे रहा है. कोरोना में लंबे समय तक परिवार वालों ने खुद और रिश्तेदारों से ब्लड का इंतजाम किया. अब ऐसा कोई बचा ही नहीं है, जिससे ब्लड ले सकेंगे.

कहां से लाएं ब्लड
अयोध्या नगर में रहने वाले प्रशांत शर्मा ने बताया कि उनके बेटे को भी हर 15 दिन में ब्लड चढ़ाना पड़ता है. परिवार, रिश्तेदार और साथियों की मदद से ब्लड की व्यवस्था हो जाती है. लेकिन कोरोना के बाद ब्लड बैंक में ब्लड नहीं मिल रहा है. इसलिए डेढ़ साल से काफी दिक्कत का सामना करना पड़ रहा है. उनका कहना है शासन-प्रशासन और सरकार को इस तरफ ध्यान देना चाहिए ताकि बच्चों को समय पर ब्लड मिल सके.

इसलिए ज़रूरी है ब्लड
थैलेसीमिया पीड़ित बच्चों की उम्र के अनुसार 15 दिन से लेकर एक महीने के बीच इन्हें ब्लड चढ़ाना होता है. इस समय लोग कोरोना संक्रमित होने और वैक्सीन लगाने के लिए ब्लड देने से मना कर रहे हैं. शहर में एक बार ब्लड मिल भी जाता है, लेकिन गांव से आने वाले लोगों को डोनर ढूंढने में सबसे ज्यादा दिक्कत होती है. थैलेसीमिया रोग एक तरह का रक्त विकार है. इसमें बच्चे के शरीर में रेड ब्लड सेल का प्रोडक्शन सही तरीके से नहीं हो पाता है. और इन कोशिकाओं की आयु भी बहुत कम हो जाती है. इसकी वजह से बच्चों को एक महीने या उससे कम समय में एक यूनिट ब्लड की जरूरत पड़ती है.

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