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 CM हाउस लिए पैदल निकले हरदा फैक्टरी ब्लॉस्ट के पीड़ित

भोपाल। फैक्टरी ब्लास्ट केस के पीड़ित मुख्यमंत्री से न्याय की गुहार लगाने हरदा से भोपाल के लिए पैदल निकल चुके हैं। 150 किमी इस पैदल यात्रा में महिलाएं समेत बच्चे और बुजूर्ग भी शामिल है।

पीड़ितों की मांग है कि उन्हें जल्द से जल्द मकान दिये जाना चाहिए। न्याय के लिए इस पैदल यात्रा में करीब 100 लोग शामिल है। हालांकि 15 नवंबर, शुक्रवार सुबह 11.30 बजे पुलिस ने पीड़ितों को नेमावर में ही रोक लिया है।पीड़ितों में शामिल अशोक लूनिया ने बंसल न्यूज डिजिटल को बताया कि नेमावर पुलिस ने नर्मदा ब्रिज के बाद उन्हें रोक लिया है। वह यहां से आगे भोपाल के लिए बढ़ने नहीं दे रही है लूनिया ने कहा कि हम 9 महीनें से नर्क की जिंदगी जी रहे हैं। हमारे पास कोई रास्ता नहीं है। पुलिस भले ही लाठीचार्ज कर दे, लेकिन हम पीछे नहीं हटेंगे।

भोपाल के लिए पैदल निकले लोगों में बड़ी संख्या में बच्चे और बुजूर्ग भी शामिल है। इसलिए एक दिन में ज्यादा दूरी तय नहीं हो पा रही है। 14 नवंबर की सुबह 10 बजे पीड़ित हरदा से भोपाल के लिए पैदल रवाना हुए हैं।

यदि सबकुछ ठीक रहा तो हर दिन 50 किमी पैदल चलने का टारगेट है, लेकिन ये 40 किमी के आसपास ही चल पा रहे हैं।

6 फरवरी को हुआ था ब्लॉस्ट
हरदा के बैरागढ़ इलाके में 6 फरवरी 2024 को पटाखा फैक्टरी में ब्लॉस्ट हो गया था। धमाके की डेंसिटी इतनी अधिक थी कि कंपन 50 किमी दूर तक महसूस किये गए।

घटनास्थल से 3 किमी दूर खड़ी कारों के कांच क्रेक हो गए, बाइक गिर गई। ब्लॉस्ट के कारण सड़क से गुजर रहे लोग भी घायल हुए। घटना में 11 लोगों की मौत हुई थी और 174 घायल हुए थे।

एनजीटी के आदेश का पालन नहीं
घटना के बाद पूरे मामले का एनजीटी ने संज्ञान लिया था। एनजीटी ने अपने विस्तृत आदेश में कहा था कि इस हादसे में न्यूनतम राहत देने की जरूरत है।

घर जलने पर 5 लाख रुपए प्रति घर के हिसाब से क्षतिपूर्ति की जाए और जिनके घर खाली कराए गए हैं, उन्हें 2 लाख रुपए देने का कहा है। पीड़ित अशोक लूनिया ने बताया कि अभी तक उन्हें सिर्फ घायल को मिलने वाले सवा लाख रुपये का ही मुआवजा मिला है।

35 घर पूरी तरह से टूटे
धमाके से पटाखा फैक्टरी के आसपास के बने 35 घर पूरी तरह से टूट गए। इन घरों में रहने वाले करीब 100 लोगों को घटना के बाद से ही हरदा की अजनाल नदी के पास बनी शासकीय आईटीआई में ठहराया गया है 9 महीने से ये लोग वहीं रहकर जैसे तैसे जीवनयापन कर रहे हैं। एनजीटी के आदेश के बाद भी मकान की क्षतिपूर्ति राशि अभी तक पीड़ितों को नहीं मिली है।

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