Prada Kolhapuri Chappal Controversy: हाल ही में इटालियन लग्जरी ब्रांड प्राडा ने पारंपरिक कोल्हापुरी चप्पल जैसी डिजाइन वाली चप्पलें 1.20 लाख रुपये की कीमत पर बेचनी शुरू की। यह मामला सोशल मीडिया पर तब गर्माया जब कर्नाटक सरकार के मंत्री प्रियंक खड़गे ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि यह सिर्फ डिजाइन की चोरी नहीं बल्कि उन कारीगरों की अनदेखी है जो पीढ़ियों से यह कला जीवित रखे हुए हैं।
प्रियंक खड़गे ने बताया कि बेलगावी, बागलकोट और धारवाड़ जैसे जिलों के अथानी, निप्पाणी, चिक्कोडी और रायबाग जैसे कस्बों में हजारों कारीगर रहते हैं जो कोल्हापुरी चप्पलों का निर्माण करते हैं। उन्होंने कहा कि इन क्षेत्रों में यह कला पीढ़ियों से चली आ रही है लेकिन पहचान के नाम पर इन कारीगरों को आज भी हाशिये पर रखा जाता है। कोल्हापुर में बिकने वाली चप्पलों की असली जड़ें इन कस्बों में ही हैं।
So, Prada is selling what are essentially Kolhapuri chappals for ₹1.2 lakh a pair.
Few know this: a large number of the artisans who make these iconic chappals actually live in Karnataka, in Athani, Nippani, Chikkodi, Raibag and other parts of Belagavi, Bagalkot and Dharwad.…
— Priyank Kharge / ಪ್ರಿಯಾಂಕ್ ಖರ್ಗೆ (@PriyankKharge) June 29, 2025
GI टैग की साझा लड़ाई
मंत्री ने याद दिलाया कि जब वे सामाजिक कल्याण मंत्री थे तब महाराष्ट्र ने कोल्हापुरी चप्पलों के GI टैग पर अपना विशेषाधिकार जताने की कोशिश की थी। लेकिन कर्नाटक की ओर से LIDKAR के माध्यम से इसका विरोध किया गया और यह सुनिश्चित किया गया कि कर्नाटक के कारीगरों को उनका हक मिले। अंततः कर्नाटक और महाराष्ट्र के चार-चार जिलों को संयुक्त रूप से GI टैग दिया गया जो दोनों राज्यों की साझा सांस्कृतिक विरासत को दर्शाता है।
GI टैग से आगे बढ़कर जरूरत है वैश्विक मंच की
खड़गे ने स्पष्ट किया कि GI टैग केवल कानूनी अधिकार देता है लेकिन उससे कारीगरों की जिंदगी नहीं बदलती। उन्होंने कहा कि इन कारीगरों को वैश्विक स्तर पर मंच देना, उनके हुनर को ब्रांडिंग और डिज़ाइन इनोवेशन से जोड़ना और उन्हें अच्छा दाम दिलवाना बेहद जरूरी है। उन्होंने इसे ‘संस्कृतिक उद्यमिता’ की आवश्यकता बताया।
मंत्री ने मांग की कि जब कोई अंतरराष्ट्रीय फैशन हाउस भारतीय डिज़ाइन को अपनाए तो उसे उस डिज़ाइन के मूल कारीगरों को श्रेय देना चाहिए। उनके नाम, परंपरा और मेहनत को भी उतनी ही प्रमुखता मिलनी चाहिए जितनी उत्पाद को। उन्होंने कहा कि यह केवल सम्मान की बात नहीं है बल्कि आत्मनिर्भर भारत की दिशा में एक जरूरी कदम है।


