MP News: धार जिले के बहुचर्चित भोजशाला विवाद मामले में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान मुस्लिम पक्ष ने महत्वपूर्ण दावे पेश किए हैं। पक्षकारों का कहना है कि ऐतिहासिक और राजस्व रिकॉर्ड में इस स्थल को मस्जिद के रूप में दर्ज किया गया है। उनके अनुसार, पुराने दस्तावेजों में कहीं भी राजा भोज द्वारा किसी सरस्वती मंदिर के निर्माण का स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता, जिससे हिंदू पक्ष के दावों पर सवाल उठते हैं।
भोजशाला-कमल मौला मस्जिद कॉम्प्लेक्स पर दोहरा दावा
यह विवादित स्थल 11वीं सदी का माना जाता है, जिसे हिंदू पक्ष देवी सरस्वती का प्राचीन मंदिर बताता है, जबकि मुस्लिम पक्ष इसे कमल मौला मस्जिद के रूप में देखता है। यह पूरा परिसर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के संरक्षण में है। मुस्लिम पक्ष का प्रतिनिधित्व काजी मोइनुद्दीन कर रहे हैं, जबकि उनकी ओर से वकील नूर अहमद शेख इंदौर बेंच के समक्ष पक्ष रख रहे हैं। मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला और न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी की खंडपीठ कर रही है।
पीआईएल और ऐतिहासिक दावों को लेकर बहस तेज
सुनवाई के दौरान काजी मोइनुद्दीन ने हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस सहित अन्य पक्षों द्वारा दायर जनहित याचिकाओं (PIL) पर सवाल उठाए। इन याचिकाओं में दावा किया गया है कि भोजशाला वास्तव में सरस्वती मंदिर है और वहां केवल हिंदुओं को पूजा का अधिकार होना चाहिए। मुस्लिम पक्ष का कहना है कि यह दावे ऐतिहासिक तथ्यों से मेल नहीं खाते और उन्हें अदालत को गुमराह करने वाला बताया गया है। पक्षकारों ने यह भी कहा कि उनके पूर्वज इस स्थल से ऐतिहासिक रूप से जुड़े रहे हैं और इसे लंबे समय से धार्मिक उपयोग में रखा गया है।
एएसआई की भूमिका और अदालत में आगे की सुनवाई
मुस्लिम पक्ष ने यह भी आरोप लगाया कि एएसआई (ASI) ने इस मामले में अपनी रिपोर्ट और रुख समय-समय पर बदला है, जिससे जांच की निष्पक्षता पर सवाल खड़े होते हैं। उन्होंने वैज्ञानिक सर्वेक्षण और वीडियोग्राफी प्रक्रिया पर भी आपत्ति जताई है। पक्ष ने अदालत से इन सभी प्रक्रियाओं की विस्तृत जांच की मांग की है। अदालत में यह भी तर्क दिया गया कि धार्मिक संपत्तियों के प्रबंधन में पारंपरिक अधिकारों का भी महत्व होता है। मामले की सुनवाई लगातार जारी है और अगले चरण में और विस्तृत बहस होने की संभावना है।


