Bhopal AIIMS: एम्स भोपाल में दवा घोटाला? केंद्र की टीम का बड़ा खुलासा, एम्स में सीधे खरीद से बढ़ा 60 करोड़ का खर्च

Bhopal AIIMS: मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल स्थित ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज यानी एम्स में दवाओं की महंगे दाम पर खरीद को लेकर उठे सवालों की जांच करने के लिए केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की एक विशेष टीम भोपाल पहुंची। इस टीम ने एम्स के दस्तावेजों की गहराई से जांच की और दवा खरीद की प्रक्रिया की पूरी जानकारी लेने के लिए निदेशक डॉ. अजय सिंह सहित अन्य वरिष्ठ अधिकारियों से करीब चार घंटे तक बातचीत की।

सांसद आलोक शर्मा ने उठाया था मुद्दा

यह पूरा मामला तब सामने आया जब भोपाल से सांसद आलोक शर्मा, जो एम्स की स्टैंडिंग फाइनेंस कमेटी के सदस्य भी हैं, ने इस विषय को 15 मई को दिल्ली स्थित निर्माण भवन में आयोजित बैठक में उठाया। इस बैठक में केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव पुन्या सलीला श्रीवास्तव भी मौजूद थीं। शर्मा ने बताया कि उन्हें शिकायत मिली थी कि कैंसर की एक दवा ‘जेम्सिटाबीन इंजेक्शन’ को भोपाल एम्स ने ₹2100 प्रति इंजेक्शन की दर से खरीदा जबकि रायपुर एम्स में यही दवा ₹425 और दिल्ली एम्स में केवल ₹285 में खरीदी गई।

Bhopal AIIMS: एम्स भोपाल में दवा घोटाला? केंद्र की टीम का बड़ा खुलासा, एम्स में सीधे खरीद से बढ़ा 60 करोड़ का खर्च

दवाओं की कीमतों में भारी अंतर

सांसद के अनुसार, सिर्फ एक ही दवा नहीं बल्कि कई अन्य दवाओं की कीमतों में भी काफी अंतर पाया गया। भोपाल एम्स ने जिन दरों पर दवाएं खरीदीं, वे बाजार और अन्य एम्स संस्थानों से काफी ज्यादा थीं। यह सवाल इसलिए भी अहम हो जाता है क्योंकि इन दवाओं की खरीद का सीधा असर मरीजों पर पड़ता है।

वित्तीय नियमों का उल्लंघन बताया गया

शर्मा का कहना है कि इस मामले में केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित जनरल फाइनेंशियल रूल्स (GFR 2017) का उल्लंघन हुआ है। आरोप है कि एम्स भोपाल ने ‘अमृत फार्मेसी’ से सीधे दवा खरीद कर पूरी आपूर्ति वहीं से करवाई, जबकि इस फार्मेसी को केवल आपातकालीन खरीद की इजाजत होती है। दूसरी एम्स संस्थाओं में दवा खरीद के लिए टेंडर की प्रक्रिया अपनाई जाती है।

कोविड काल की खरीद प्रक्रिया अब भी जारी

कोविड महामारी के दौरान शुरू हुई यह सीधी खरीद प्रक्रिया अब भी जारी है और इसका वार्षिक खर्च ₹25 करोड़ से बढ़कर ₹60 करोड़ तक पहुंच गया है। जबकि इससे पहले इसका आंकड़ा मात्र ₹10 से ₹15 लाख होता था। इस भारी खर्च में अचानक आई बढ़ोतरी से वित्तीय अनियमितताओं और भ्रष्टाचार की आशंका जताई जा रही है। अब केंद्रीय टीम की रिपोर्ट से यह साफ होगा कि वाकई एम्स भोपाल में गड़बड़ी हुई है या नहीं।

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