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बच्चों का आकर्षण हो रहा है फास्ट फूड की तरफ, जबकि मां के हाथ का खाना है पौष्टिक

हरदा। सवाल अब हमारे नौनिहालो की सेहत का है। जिसके लिए हमें सजग रहना बहुत ही जरूरी है। बच्चे के भविष्य के लिए क्या सही है क्या गलत है? यह सब उसकी पढ़ाई स्कूल,कालेज,जॉब और जीवनसाथी के लिए कितना चुनाव करते है। शरीर विज्ञान के अनुसार हमारे द्वारा खाया।जाने वाला भोजन सुपाच्य होना चाहिए। भोजन ऐसा हो कि जो दांतो द्वारा चबाया जाए एवं जीभ और दांतो की लार से उसे रसयुक्त बनाकर शरीर के अंदर जाए हमारे ग्रास नली से होते हुए ये अमाशय में जाएगा।

जहां अम्ल व एसिड के साथ ये आंतो में पहुंचेगा। आंतो में यह पचता है। जहां इसकी उर्जा ग्रहण कर शरीर इसे मलाशय की ओर धकेल देता है। प्राकृतिक चिकित्सकों का मानना है कि शरीर स्वयं अपने पाचन प्रणाली का मजबूत रखता है।जब उसकी प्रकृति के विरूद्ध भोजन करते है तो उसे अत्याधिक कार्य करना पड़ता है। मैदा या ज्यादा बारिक आटे के बने हुए खाद्य पदार्थ को आंते पचा नही पाती है। आंतो की आंतरिक संरचना में जो रेशे होते है वो बारिक खाद्य सामग्री में कार्य नही कर पाते है। भोजन का एक नियम है कि या तो पचेगा या सड़ेगा। इस प्रकार का आंतो में जमा हुआ भोजन धीरे-धीरे सड़ने लगता है।

इस लिए दांतो से एक सार होकर निगल जाए ऐसा भोजन करना चाहिए। बाजारू आयटम का सेवन करने से वो आंतो में जाकर पाचन क्रिया को कमजोर कर देते है। कई बार तो महिनों तक ये पचते नही है। इससे हमारे पेट की अनेक समस्या खड़ी हो जाती है जैसे गैस का बनना,पेट का फूलना,आंतो में मरोड़,शौच का न आना,सिरदर्द,पेट दर्द आदि बहुत सी समस्या बढ़ती है। पुरानी कहावत है पेट भारी तो माथा भारी। जिसका पाचन कमजोर होता है उसका पूरी दैनिक दिनचर्या गड़बड़ हो जाती है।

 

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