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इंडिया आउट वाले मालदीव की निकल गई हेकड़ी, अब मांग रहा भारत से भीख

कुछ महीनों पहले तक मालदीव ने “इंडिया आउट” अभियान चलाया था, और वहां के मंत्रियों ने सोशल मीडिया पर भारत के खिलाफ विवादास्पद टिप्पणियाँ भी की थीं। ऐसा माना जा रहा था कि यह तेवर मौजूदा सरकार की चीन समर्थक नीति के कारण थे। लेकिन अब इस द्वीप देश का रुख नरम होता दिखाई दे रहा है, और वह भारत के करीब आने की कोशिश कर रहा है। यह सवाल उठता है कि क्या मालदीव का चीन से मोहभंग हो गया है, या फिर भारत की अहमियत उसके लिए बढ़ गई है? आइए, इसे समझते हैं।

नवंबर 2023 में जब मुइज्जू ने राष्ट्रपति पद संभाला, तो उन्होंने “इंडिया आउट” अभियान की शुरुआत की। वे अपने देश में मौजूद भारतीय सैनिकों के छोटे से दल को वापस भेजने के पक्ष में थे, जो कि मालदीव की सहायता के लिए वहां तैनात थे। इसके अलावा, मालदीव के तीन मंत्रियों ने सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लक्षद्वीप दौरे पर आपत्तिजनक टिप्पणियाँ की थीं। भारत की आपत्ति के बाद इन्हें हटाया तो गया, लेकिन यह स्पष्ट हो गया कि मालदीव भारत से दूरी बना रहा था।

मालदीव की अर्थव्यवस्था काफी हद तक भारत पर निर्भर है, खासकर पर्यटन और व्यापार के क्षेत्रों में। 2021 में भारत, मालदीव का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार बन गया था। भारत मालदीव से स्क्रैप धातुएं खरीदता है, जबकि उसे इंजीनियरिंग और औद्योगिक उत्पाद जैसे फार्मास्यूटिकल्स, रडार उपकरण, और सीमेंट निर्यात करता है। मुइज्जू सरकार ने दूसरे देशों से व्यापारिक रिश्ते बढ़ाने की कोशिश की, लेकिन दूरी और लागत के कारण आयात महंगा पड़ने लगा। दूसरी ओर, भारत अपने पड़ोसी देशों को न्यूनतम दर पर उत्पाद भेजता रहा है।

पर्यटन पर पड़ा असर

भारत के साथ तल्खी दिखाने का सीधा असर मालदीव के पर्यटन उद्योग पर पड़ा। मालदीव की अर्थव्यवस्था में पर्यटन का योगदान 28% से अधिक है। 2022 में यहां आने वाले भारतीय पर्यटकों की संख्या लगभग 3 लाख थी, जो कुल पर्यटन का 14.4% थी। भारत से रुखाई दिखाने का असर पर्यटन पर भी पड़ा, जो मालदीव की अर्थव्यवस्था के लिए नुकसानदायक साबित हुआ।

मालदीव हिंद महासागर में मुख्य शिपिंग लेन के पास स्थित है, जो चीन, जापान, और भारत जैसे देशों को ऊर्जा आपूर्ति सुनिश्चित करता है। चीन ने समुद्री डकैती विरोधी अभियानों के नाम पर कुछ साल पहले हिंद महासागर में अपने नौसैनिक जहाज भेजने शुरू कर दिए थे, जिससे भारत के लिए मालदीव का महत्व और बढ़ गया। यदि भारत मालदीव पर ध्यान नहीं देता, तो उसकी सुरक्षा को खतरा हो सकता है।

आर्थिक चुनौतियों का सामना करते हुए, मालदीव ने अपनी रणनीति बदल दी है। पिछले महीने अपने स्वतंत्रता दिवस के मौके पर मुइज्जू ने भारत का जिक्र करते हुए उसे धन्यवाद दिया। भारत ने मालदीव को न केवल बड़ा कर्ज दिया है, बल्कि कर्ज वापसी के लिए कड़ी शर्तें भी नहीं रखीं। मुइज्जू ने भविष्य में भारत के साथ मुक्त व्यापार समझौते की भी उम्मीद जताई। कुल मिलाकर, मुइज्जू सरकार के नए रुख में “इंडिया आउट” की जगह “इंडिया फर्स्ट” की झलक दिखाई दे रही है।

कुछ समय पहले मुइज्जू प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होने भारत आए थे। इसके बाद, दोनों देशों के रिश्तों में सुधार होने लगा। विदेश मंत्री एस जयशंकर का हालिया मालदीव दौरा भी इसी दिशा में एक कदम माना जा रहा है। इस दौरे के दौरान, उन्होंने मालदीव की सबसे बड़ी जल और स्वच्छता परियोजना का उद्घाटन किया, जिसमें भारत ने लगभग 11 करोड़ डॉलर की सहायता दी थी। इसके अलावा, दोनों देशों के बीच यूपीआई से भुगतान शुरू करने के समझौते पर हस्ताक्षर हुए और आपसी संबंधों को मजबूत करने पर चर्चा हुई।

मालदीव ने चीन और भारत की कर्ज नीतियों में अंतर को समझा है। चीन भारी-भरकम कर्ज तो देता है, लेकिन उसकी शर्तें बहुत सख्त होती हैं। यदि देश समय पर ऋण नहीं चुका पाते, तो उनकी संपत्ति पर चीन का नियंत्रण हो सकता है, जैसा कि श्रीलंका के हंबनटोटा बंदरगाह के साथ हुआ। इसके विपरीत, भारत की कर्ज नीति अधिक लचीली है और ब्याज दरें भी न्यूनतम होती हैं। इसके अलावा, भारत स्थानीय मामलों में हस्तक्षेप से बचता है, जबकि चीन अक्सर ऐसा करता है। इसी कारण, मालदीव ने अपने रुख में बदलाव किया और अब वह भारत के करीब आ रहा है।

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