JP Nadda। देश की मेडिकल शिक्षा प्रणाली पर सीधा सवाल खड़ा करता हुआ अब तक का सबसे बड़ा घोटाला उजागर हुआ है। केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) ने फॉर्मेसी और मेडिकल कॉलेजों की मान्यता से जुड़े 5400 करोड़ रुपये के घोटाले का पर्दाफाश किया है। इस संगठित रैकेट में स्वास्थ्य मंत्रालय, राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग (NMC), विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के वरिष्ठ अफसरों से लेकर निजी कॉलेजों तक की मिलीभगत सामने आई है।
गोपनीय दस्तावेजों की लीकिंग से लेकर हवाला तक फैला नेटवर्क
CBI जांच के अनुसार, दिल्ली स्थित मंत्रालय और NMC के अफसर कॉलेजों की मान्यता से जुड़ी गोपनीय फाइलें, निरीक्षण की तारीखें और अफसरों की टिप्पणियां तक बिचौलियों को भेजते थे। बदले में मोटी रकम वसूली जाती थी। इन सूचनाओं के आधार पर मेडिकल कॉलेज अपनी तैयारी करते और मान्यता के नाम पर मोटी रिश्वत देते।
डॉ. मोंटू पटेल का ‘रेट कार्ड’… हर कॉलेज से 8 से 15 लाख की वसूली
फॉर्मेसी काउंसिल ऑफ इंडिया (PCI) के चेयरमैन डॉ. मोंटू पटेल इस रैकेट का बड़ा चेहरा हैं। सीबीआई की छापेमारी के बाद से वह फरार हैं। रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि उन्होंने देशभर के 12,000 से अधिक फॉर्मेसी कॉलेजों से रिन्युअल और मान्यता के नाम पर सालाना 8–15 लाख रुपये की वसूली की है। कोरोना काल में इनटेक कम करके कॉलेजों को धमकाया गया। फर्जी तरीके से PCI चेयरमैन बने रहने के लिए उन्होंने दीव-दमन की फॉर्मेसी काउंसिल से सदस्यता भी ले रखी थी। उनके करीबी जशु चौधरी और निजी ड्राइवर के नाम पर गुजरात और उत्तर प्रदेश में जमीनें खरीदी गईं। हवाला के ज़रिए कनाडा स्थित एक प्रोफेसर को करोड़ों की रकम भेजी गई।

पूर्व UGC चेयरमैन डीपी सिंह पर भी गंभीर आरोप…
इस पूरे घोटाले में सबसे चौंकाने वाला नाम पूर्व यूजीसी चेयरमैन और वर्तमान में टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (TISS) के चांसलर डीपी सिंह का है। CBI की FIR में उन्हें गोपनीय जानकारी लीक करने और कॉलेजों के पक्ष में सिफारिश करने का आरोपी बनाया गया है।
एनएमसी की सीमित कार्रवाई…
NMC ने रिश्वत लेते पकड़े गए एक असेसर को जांच लंबित रहने तक ब्लैकलिस्ट किया है और कर्नाटक के एक मेडिकल कॉलेज की यूजी/पीजी सीट रिन्युअल रद्द कर दी है। लेकिन विशेषज्ञों का सवाल है कि क्या इतने बड़े घोटाले के बाद सिर्फ यही कार्रवाई पर्याप्त है?
स्वास्थ्य मंत्रालय के अधीन भ्रष्टाचार का ‘कॉर्पोरेटाइजेशन’?
मेडिकल शिक्षा घोटाले ने न सिर्फ देश की स्वास्थ्य शिक्षा व्यवस्था को हिला कर रख दिया है, बल्कि अब सीधे सवाल केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा के नेतृत्व पर उठ रहे हैं। यह घोटाला स्वास्थ्य मंत्रालय के अंतर्गत काम करने वाले संस्थानों राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग (NMC) और फॉर्मेसी काउंसिल ऑफ इंडिया (PCI) से जुड़ा है। ये वही संस्थान हैं, जिनकी निगरानी और कार्यप्रणाली पर अंतिम जिम्मेदारी केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा की होती है। ऐसे में सवाल उठना लाजमी है… क्या नड्डा को इतने बड़े रैकेट की भनक नहीं थी? अगर थी, तो अब तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई? और अगर नहीं थी, तो क्या ये मंत्रालय में “अंधा सिस्टम” चल रहा है? इस घोटाले ने देश में मेडिकल और फॉर्मेसी एजुकेशन के बाजारीकरण को उजागर किया है। जब सरकारी अफसर निजी कॉलेजों के दलाल बन जाएं, और मान्यता ‘रेट कार्ड’ से तय हो तो देश का भविष्य कैसे सुरक्षित रहेगा?
नड्डा की चुप्पी… साजिश या असहायता?
CBI ने दिल्ली, गुजरात, कर्नाटक समेत कई राज्यों में छापे मारे, 36 लोगों को नामजद किया। जिनमें PCI चेयरमैन डॉ. मोंटू पटेल और पूर्व UGC चेयरमैन डीपी सिंह जैसे बड़े नाम शामिल हैं… लेकिन जेपी नड्डा अब तक एक भी बयान नहीं दे सके। जब देश की स्वास्थ्य शिक्षा की साख पर सवाल हो, तब जिम्मेदार मंत्री की चुप्पी कई संदेह पैदा करती है। क्या यह चुप्पी उनके किसी राजनीतिक संरक्षण को छुपा रही है? क्या वे खुद इस भ्रष्ट नेटवर्क को नजरअंदाज करते रहे? इतने बड़े घोटाले के सामने आने के बावजूद जेपी नड्डा ने अब तक इस पर कोई बयान नहीं दिया है। न कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस, न कोई मंत्रालयीय स्पष्टीकरण। विपक्षी दलों ने इसे “सिस्टमेटिक करप्शन” करार देते हुए प्रधानमंत्री से नड्डा को हटाने की मांग की है।
मंत्रालय की नाक के नीचे चल रहा था फर्जीवाड़ा…
PCI चेयरमैन मोंटू पटेल ने हजारों कॉलेजों से सालाना करोड़ों की उगाही की। स्वास्थ्य मंत्रालय से जुड़ी गोपनीय फाइलें बिचौलियों को भेजी गईं। NMC के अधिकारी रिश्वत लेकर निरीक्षण की तारीखें तय कर रहे थे… मंत्रालय को इसकी सूचना क्यों नहीं लगी? या जानबूझकर अनदेखा किया गया? ये सब मंत्रालय के भीतर के सिस्टम को “रैकेटाइज्ड” और भ्रष्ट साबित करते हैं। CBI की एफआईआर और छापेमारी से यह बात साफ हो चुकी है कि मंत्रालय के कुछ अफसर निजी कॉलेजों से मिलीभगत कर नकली निरीक्षण, रेट फिक्सिंग, और फर्जी दस्तावेजों के ज़रिए कॉलेजों की मान्यता दिलवा रहे थे। इतनी बड़ी गतिविधियां बिना उच्च स्तर की जानकारी और सहमति के संभव नहीं मानी जा रही।
यह सिर्फ घोटाला नहीं, भरोसे की हत्या है
इस घोटाले ने न केवल देश की मेडिकल शिक्षा की साख को धक्का पहुंचाया है, बल्कि उन लाखों छात्रों और अभिभावकों के भरोसे को तोड़ा है, जो मेडिकल क्षेत्र में ईमानदारी से भविष्य बनाने का सपना देखते हैं। अब सवाल यह है। क्या मोदी सरकार जेपी नड्डा पर कार्रवाई करेगी? क्या यह मामला सिर्फ CBI जांच तक सीमित रह जाएगा या मंत्री की जिम्मेदारी भी तय की जाएगी? “ना खाऊँगा, ना खाने दूँगा” के नारे के साथ दोबारा सत्ता में आई केंद्र सरकार के लिए यह घोटाला एक बड़ी साख की चुनौती बन गया है। जेपी नड्डा की चुप्पी और मंत्रालय के अधीन इस स्तर के भ्रष्टाचार से सवाल खड़ा हो गया है। क्या इस सरकार में कोई मंत्री जवाबदेह भी है?


