MP News: ग्वालियर स्थित राजमाता विजयाराजे सिंधिया कृषि विश्वविद्यालय में कृषि वैज्ञानिकों ने एक अनोखी तकनीक के तहत आलू के बीज तैयार करना शुरू कर दिया है। इस प्रक्रिया को एयरोपोनिक्स (Aeroponics) कहा जाता है, जिसमें पौधे जमीन की जगह हवा में उगाए जाते हैं। इस विधि से पौधों की जड़ों पर छोटे-छोटे आलू बनते हैं, जिनकी संख्या लगभग 1000 प्रति पौधा होती है। इन आलुओं को जड़ों से सावधानीपूर्वक निकाल कर बीज के रूप में तैयार किया जाता है। यह विधि मध्यप्रदेश में पहली बार अपनाई गई है और इसका उद्देश्य किसानों को उच्च गुणवत्ता वाले आलू के बीज प्रदान कर उनकी उपज बढ़ाना है।
पूरी तरह वायरस मुक्त और उच्च गुणवत्ता वाले
राजमाता कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों के अनुसार, यह एयरोपोनिक्स तकनीक केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान, शिमला द्वारा पेटेंटेड है। इस तकनीक में पौधों को टिशू कल्चर टेक्नोलॉजी के माध्यम से वायरस मुक्त वातावरण में विकसित किया जाता है। डॉ. सुषमा तिवारी ने बताया कि इस विधि से उगाए गए पौधे न केवल पूरी तरह से रोगमुक्त होते हैं, बल्कि इससे 40 से 50 छोटे आलू प्रति पौधा बनते हैं, जो उत्पादन को कई गुना बढ़ा देते हैं। विश्वविद्यालय की प्रयोगशाला में इस तकनीक के तहत 19 किस्मों के आलू लगाए गए हैं और इन पर निरंतर शोध जारी है।

1 किलो बीज से 400 किलो आलू उत्पादन
विश्वविद्यालय के छात्र रमेश सिंह जो इस प्रोजेक्ट पर काम कर रहे हैं, बताते हैं कि एयरोपोनिक्स विधि में पौधों को पोषक तत्व और पानी एक विशेष समाधान के जरिए सीधे हवा में दिया जाता है। इससे पौधे खेतों में उगाए जाने वाले आलुओं की तरह वायरस की चपेट में नहीं आते, जिससे उत्पादन बेहतर होता है। अभी तक 1 किलो बीज से लगभग 400 किलो आलू तैयार हो चुका है। जल्द ही ये वायरस मुक्त आलू के बीज किसानों को दिए जाएंगे, जिससे उनकी उपज में सुधार होगा और आर्थिक लाभ भी मिलेगा। यह तकनीक खासतौर पर उन किसानों के लिए फायदेमंद है जिनके पास जमीन कम है या जो उच्च उत्पादन चाहते हैं।
एयरोपोनिक्स क्या है? खेती की नई क्रांति जो बिना मिट्टी के बढ़ाए फसल
एयरोपोनिक्स एक ऐसी उन्नत कृषि तकनीक है जिसमें पौधे बिना मिट्टी के हवा में उगाए जाते हैं। इस प्रक्रिया में पौधों को आवश्यक पोषण तत्व और जल विशेष तरीके से सीधे जड़ों तक पहुंचाए जाते हैं। इससे पौधों को कोई बीमारियां नहीं लगती और उपज में तेजी से वृद्धि होती है। एक पौधा इस तकनीक से 50 से अधिक छोटे आलू पैदा कर सकता है। इसके अलावा, किसानों को पांच वर्षों तक बीज खरीदने की जरूरत नहीं पड़ती। यह तकनीक छतों या छोटे स्थानों पर भी अपनाई जा सकती है, जिससे शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में खेती को बढ़ावा मिलेगा। किसानों में इस नई विधि को लेकर उत्साह बढ़ रहा है और इसे भविष्य की खेती के रूप में देखा जा रहा है।


