MP News: भगीरथपुरा में पानी की मिलावट से हुई मौतों ने पूरे देश का ध्यान इंदौर की ओर खींचा है। यह आश्चर्य का विषय है कि देश के सबसे स्वच्छ शहर में पीने के पानी की स्थिति इतनी गंभीर क्यों है। इंदौर वर्तमान में नर्मदा नदी से अपना पानी प्राप्त करता है। शहर के भीतर कोई प्राकृतिक नदी नहीं है जो पर्याप्त ताजे पानी का प्रवाह देती हो। इसलिए यशवंत सागर जैसी बड़ी जलाशयों की आवश्यकता फिर से महसूस हो रही है, ताकि शहर पूरी तरह नर्मदा जल पर निर्भर न रहे।
संकट से समाधान की कहानी
1928 के जल संकट के दौरान यशवंत सागर का निर्माण किया गया था, जिसने 1939 में इंदौर की जल आपूर्ति का मुख्य स्रोत बनकर शहर के लिए जीवनदायिनी भूमिका निभाई। इसके बाद 1965-66 के संकट ने नर्मदा जल को शहर तक लाने की योजना को गति दी। 1978 में यह प्रयास सफल हुआ और शहर में नर्मदा जल उपलब्ध हुआ। अब शहर की आबादी बढ़कर 31 लाख के करीब पहुंच गई है, और नए क्षेत्रों तथा 29 गांवों को जल आपूर्ति की आवश्यकता है। नर्मदा परियोजना के तीसरे चरण के बाद चौथे चरण की तैयारी भी चल रही है, जो जल आपूर्ति को और मजबूत करेगी।
जल संरक्षण की आवश्यकता
इंदौर में पहले प्राचीन तालाब, बावड़ियां और कुएँ शहर के जल संरक्षण का मूल आधार थे। हाल के वर्षों में विकास के नाम पर इन्हें बंद कर दिया गया है। इस साल मुख्यमंत्री मोहन यादव ने ‘जल गंगा समवर्धन अभियान’ शुरू किया, जिसमें बिलवाली, छोटा सिरपुर, लिम्बोदी और निपानिया तालाबों के पुनरुद्धार का काम शामिल है। 542 कुओँ में से 282 को जनता की भागीदारी से पुनर्जीवित किया गया, और 53 प्राचीन बावड़ियों में से 21 की सफाई की गई। यह पहल जल संरक्षण और भूजल पुनर्भरण के लिए अहम कदम साबित हो रही है।
नर्मदा जल का बेहतर उपयोग और जलाशयों का निर्माण
सामाजिक कार्यकर्ता किशोर कोडवानी के अनुसार इंदौर में नर्मदा जल का लगभग 30 प्रतिशत भूजल में सोख जाता है। यह भूजल पुनर्भरण का सबसे बड़ा स्रोत है। यदि यह प्रक्रिया बंद हुई, तो शहर को गंभीर जल संकट का सामना करना पड़ेगा। वृक्षों की कटाई, तालाबों और झीलों का सिकुड़ना और शहर की जलवायु पर इसका असर चिंता का विषय हैं। भविष्य के लिए जल संचयन, तालाबों की जलधारण क्षमता बढ़ाना और यशवंत सागर जैसे नए जलाशयों का निर्माण आवश्यक है। इसके लिए जनता और सरकार दोनों को ठोस प्रयास करने होंगे।


