MP News: दमोह में दलित दूल्हे ने घोड़े पर लेकर निकाली बारात, संविधान की प्रति से दिया संदेश

MP News: मध्य प्रदेश के दमोह जिले के कुआं खेड़ा महदेड़ा गांव में एक ऐसा घटना सामने आई जिसने पूरे जिले में चर्चा का विषय बन गई है। यहां के दलित समुदाय के एक युवक नंदू बंसल ने अपनी शादी की बारात में एक पुरानी परंपरा को तोड़ते हुए घोड़े पर सवार होकर हाथ में संविधान की प्रति लेकर जुलूस निकाला। यह पहली बार है जब स्वतंत्रता के बाद इस गांव में दलित समुदाय की बारात घोड़े पर निकाली गई है। गांव में दशकों से चली आ रही यह परंपरा थी कि दलित समुदाय के लोग शादी की बारात में घोड़े पर सवार नहीं हो सकते और दूल्हा घोड़े पर जुलूस की अगुवाई नहीं कर सकता। इस पारंपरिक बंदिश को तोड़ना नंदू बंसल और उनके परिवार के लिए एक साहसिक कदम था।

परिवार ने पुलिस से मांगी सुरक्षा

जब नंदू बंसल ने इस परंपरा को तोड़ने का निर्णय लिया, तो परिवार ने सुरक्षा के लिए एसपी कार्यालय में ज्ञापन दिया। इस ज्ञापन के बाद दमोह के एसपी और कलेक्टर ने तत्काल कार्रवाई करते हुए एक टीम गांव भेजी। टीम ने गांव के दलित समुदाय और अन्य जातियों के लोगों से बात की। तहसीलदार उमेश तिवारी ने बताया कि ज्ञापन मिलने के बाद गांव के लोगों से बातचीत की गई। ग्रामीणों ने कहा कि अब ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं है कि किसी जाति के व्यक्ति की बारात घोड़े पर नहीं जा सकती। सभी ने सहमति जताई कि जो भी घोड़े पर बारात निकालना चाहे, वह कर सकता है। प्रशासन ने राहत की सांस ली और नंदू की बारात 5 फरवरी को बिना किसी विरोध के निकली।

MP News: दमोह में दलित दूल्हे ने घोड़े पर लेकर निकाली बारात, संविधान की प्रति से दिया संदेश

बारात के दिन पुलिस सुरक्षा में गांव में उत्सव का माहौल

बारात वाले दिन पुलिस ने गांव में सुरक्षा के लिए पर्याप्त जवान तैनात किए थे ताकि किसी प्रकार की किसी भी अप्रिय घटना को रोका जा सके। धुनों पर लोग नाच रहे थे, और दूल्हा नंदू बंसल घोड़े पर सवार होकर हाथ में संविधान की प्रति लिए हुए था। यह नजारा दर्शाता था कि इस बारात का संदेश केवल एक शादी नहीं बल्कि समानता और सामाजिक न्याय की जीत थी। ग्रामीणों के अनुसार यह पहली बार है जब स्वतंत्रता के बाद दलित समुदाय का कोई दूल्हा घोड़े पर सवार होकर जुलूस निकाल रहा था। संविधान में निहित समानता और गैर भेदभाव के अधिकार ने इस घटना को संभव बनाया। गांव के दलित समाज के लोग इस सफलता पर गर्व महसूस कर रहे थे।

दलित समुदाय ने तोड़ी पुरानी भ्रांतियां

दलित समाज के लोगों ने इस परंपरा के टूटने को बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर द्वारा बनाए गए संविधान की देन बताया। उन्होंने कहा कि संविधान के अधिकारों ने उन्हें वह हिम्मत दी कि वे सामाजिक बंधनों को चुनौती दे सकें। इस बारात ने गांव में पुराने सामाजिक भेदभाव को झुठलाकर एक नई शुरुआत की। दलित समुदाय के लोगों ने आशा जताई कि भविष्य में उनके साथ कोई अन्याय या भेदभाव नहीं होगा और वे अपनी सांस्कृतिक एवं सामाजिक आज़ादी का पूर्ण आनंद ले सकेंगे। यह घटना न केवल दमोह बल्कि पूरे प्रदेश में समानता के संदेश को फैलाने वाली एक मिसाल बन गई है।

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