MP News: तीन वर्षीय बच्ची को संथारा देने के मामले में दायर जनहित याचिका पर मंगलवार को मध्यप्रदेश हाईकोर्ट में सुनवाई हुई। कोर्ट ने इस गंभीर मामले में मुख्य सचिव, डीजीपी, विधि विभाग के प्रमुख सचिव, मानव अधिकार आयोग के अध्यक्ष और बच्ची के माता-पिता को नोटिस जारी कर अगली सुनवाई से पहले जवाब मांगा है। पिछली सुनवाई में कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया था कि बच्ची के माता-पिता को पक्षकार बनाया जाए।
मानसिक रूप से बीमार बच्ची को क्यों दिया गया संथारा
याचिका में बताया गया कि बच्ची ‘वियाना’ ब्रेन ट्यूमर से पीड़ित थी और वह मानसिक रूप से भी कमजोर थी। ऐसे में किसी भी नाबालिग या मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति को संथारा जैसे धार्मिक अनुष्ठान की अनुमति देना न केवल अमानवीय है बल्कि संविधान और बाल अधिकारों का उल्लंघन भी है। याचिका में यह स्पष्ट कहा गया कि यह परंपरा वयस्कों की व्यक्तिगत इच्छा पर आधारित होनी चाहिए, न कि मासूम बच्चों पर थोपने के लिए।

महाराज की भविष्यवाणी और संथारा का आयोजन
यह मामला 21 मार्च का है जब बच्ची के माता-पिता उसे इंदौर के एक धार्मिक संकल्प-अभिग्रहधारी महाराज के दर्शन के लिए ले गए थे। वहां महाराज ने बच्ची की अगली सुबह मृत्यु होने की भविष्यवाणी की और संथारा कराने की सलाह दी। इसके बाद माता-पिता ने उसी दिन बच्ची को संथारा दिला दिया। बाद में इस संथारा को ‘गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स’ में सबसे कम उम्र में संथारा लेने का रिकॉर्ड बताकर प्रमाण पत्र भी जारी कराया गया।
याचिकाकर्ता ने की परंपरा पर रोक लगाने की मांग
प्राशु जैन नामक याचिकाकर्ता ने वकील शुभम शर्मा के माध्यम से यह जनहित याचिका दायर की है। इसमें नाबालिग और मानसिक रूप से अस्वस्थ लोगों को संथारा देने पर पूर्ण रूप से प्रतिबंध लगाने की मांग की गई है। उनका तर्क है कि यह न केवल बच्चों के अधिकारों के खिलाफ है बल्कि यह अमानवीय भी है और इसमें धार्मिक स्वतंत्रता की आड़ में संवैधानिक मूल्यों का हनन हो रहा है।
अगली सुनवाई में होगा बड़ा फैसला
कोर्ट की डबल बेंच ने मामले में कुल 10 पक्षकारों को नोटिस जारी किया है। अब सभी को अगली सुनवाई से पहले अपने-अपने जवाब दाखिल करने होंगे। यह मामला धार्मिक आस्था और बच्चों के मौलिक अधिकारों के टकराव से जुड़ा है। अदालत इस बात पर भी विचार करेगी कि क्या इस तरह की परंपराएं बच्चों के अधिकारों पर आघात करती हैं।


