MP News: जबलपुर का बंडरकोला गांव LPG संकट में भी क्यों बना ऊर्जा आत्मनिर्भरता का उदाहरण

MP News: जबलपुर जिले के बंडरकोला गांव ने LPG संकट के बीच एक मिसाल कायम की है। जहां देश के अधिकांश हिस्सों में गैस की कमी से लोग कतारों में खड़े होकर इंतजार कर रहे हैं, वहीं इस गांव के लगभग 75 प्रतिशत घरों में खाना बनाने के लिए LPG नहीं, बल्कि गोबर गैस (बायोगैस) का इस्तेमाल होता है। 2,500 की आबादी वाले इस गांव में 400 से अधिक घर हैं और इनमें से करीब 300 घरों में बायोगैस संयंत्र लगे हुए हैं। यह संयंत्र 24 घंटे गैस की उपलब्धता सुनिश्चित करता है, जिससे महिलाओं को LPG की कमी की चिंता नहीं रहती।

गोबर प्रबंधन और मुफ्त गैस

गांव की निवासी नीता पटेल बताती हैं कि वह LPG की कमी के बारे में जानती हैं, लेकिन उनके गांव में इस समस्या का कोई अस्तित्व नहीं है। अधिकांश घरों में बायोगैस संयंत्र होने के कारण गैस आसानी से और तुरंत उपलब्ध रहती है। बायोगैस का इस्तेमाल न केवल आसान और सस्ता है, बल्कि पशु अपशिष्ट के प्रबंधन में भी मदद करता है। इसका लाभ द्विगुणित है—साफ-सफाई बनी रहती है और खाना बनाने के लिए गैस मुफ्त में उपलब्ध रहती है।

सरपंच की पहल से हुआ बदलाव

करीब 13 साल पहले तक गांव के किसी भी घर में बायोगैस संयंत्र नहीं था। 2013 में तत्कालीन सरपंच अजय पटेल ने अपने घर में बायोगैस संयंत्र स्थापित किया। उनके पास गायें थीं और पर्याप्त गोबर उपलब्ध था, जिससे संयंत्र सफलतापूर्वक काम करने लगा। इस प्रयोग की खबर धीरे-धीरे पूरे गांव में फैल गई और अन्य परिवारों ने भी इस तकनीक को अपनाना शुरू कर दिया। आज अधिकांश घरों में बायोगैस संयंत्र लगे हुए हैं और लोग अपने घरों में तीन मीटर गहरी खाई में गोबर और पानी मिलाकर गैस उत्पन्न करते हैं।

आंगन से रसोई तक सीधे गैस

बायोगैस सीधे रसोई तक पाइपलाइन के माध्यम से पहुँचती है, जिससे चूल्हा जलाना बेहद आसान हो जाता है। अजय पटेल बताते हैं कि संयंत्र लगने के बाद उन्होंने कभी LPG सिलेंडर खरीदने की जरूरत नहीं महसूस की। हालांकि समय के साथ कुछ घरों में पशु संख्या घटने के कारण बायोगैस संयंत्र बंद कर दिए गए और लोग LPG पर लौट गए। लेकिन अब LPG की बढ़ती कीमत और कमी के कारण, कई लोग अपने पुराने बायोगैस संयंत्रों को फिर से सक्रिय कर रहे हैं और गांव में स्वावलंबी ऊर्जा का एक नया उदाहरण पेश कर रहे हैं।

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