Mumbai Local Train Blast Case: हाईकोर्ट का चौंकाने वाला फैसला! 12 में से 11 आरोपी बरी, दोषी नहीं थे आरोपी

Mumbai Local Train Blast Case: 2006 में मुंबई की लोकल ट्रेनों में हुए भयानक बम धमाकों के मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट ने सोमवार को बड़ा और चौंकाने वाला फैसला सुनाया। हाईकोर्ट की दो सदस्यीय पीठ ने 12 में से 11 आरोपियों को बरी कर दिया। इनमें से 5 को पहले मौत की सजा और 7 को उम्रकैद दी गई थी। एक आरोपी कमाल अंसारी की 2022 में कोविड के चलते जेल में मौत हो चुकी है।

कोर्ट की टिप्पणी: गवाह और सबूत दोनों अविश्वसनीय

न्यायमूर्ति अनिल किलोर और न्यायमूर्ति एस.जी. चांडक की पीठ ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ शक से परे कोई ठोस सबूत पेश नहीं कर सका। कोर्ट ने यह भी कहा कि जिन लोगों के बयान पेश किए गए, जैसे टैक्सी ड्राइवर या ट्रेन यात्री, उनके द्वारा 100 दिन बाद किसी को पहचान पाना अविश्वसनीय है। कोर्ट ने यह भी कहा कि बम, बंदूक और नक्शों की जब्ती इस केस में निर्णायक नहीं थी क्योंकि अभियोजन पक्ष यह तक नहीं बता सका कि किस प्रकार का बम इस्तेमाल किया गया था।

राजनीतिक प्रतिक्रियाएं और सुप्रीम कोर्ट की मांग

हाईकोर्ट के इस फैसले पर बीजेपी नेता किरीट सोमैया ने प्रतिक्रिया देते हुए इसे बेहद दुखद और हैरान करने वाला बताया। उन्होंने मुख्यमंत्री से अपील की है कि इस केस की दोबारा जांच के लिए नई टीम बनाई जाए और सुप्रीम कोर्ट में अपील की जाए। उनका कहना है कि मुंबई के लोगों को न्याय मिलना चाहिए और दोषियों को सजा मिलनी चाहिए।

Mumbai Local Train Blast Case: हाईकोर्ट का चौंकाने वाला फैसला! 12 में से 11 आरोपी बरी, दोषी नहीं थे आरोपी

2006 की उस डरावनी शाम की याद

11 जुलाई 2006 को मुंबई लोकल ट्रेनों में केवल 11 मिनट के अंदर सात जगह धमाके हुए थे। इन धमाकों में 189 लोगों की मौत हुई और 824 से ज्यादा लोग घायल हुए थे। मुंबई एटीएस ने नवंबर 2006 में इस केस में चार्जशीट दाखिल की थी। 2015 में विशेष अदालत ने 12 आरोपियों को दोषी ठहराया था लेकिन अब हाईकोर्ट के फैसले ने इस पूरे मामले की दिशा ही बदल दी है।

सुनवाई में देरी और न्याय प्रणाली पर उठे सवाल

इस केस की सुनवाई 2015 में शुरू हुई थी जब राज्य सरकार ने मृत्युदंड की पुष्टि के लिए याचिका दायर की थी। इसके साथ ही दोषियों ने भी फैसले को चुनौती दी थी। 2024 में विशेष पीठ गठित की गई और जनवरी 2025 में फैसला सुरक्षित रख लिया गया। अब जुलाई 2025 में आए इस फैसले ने जांच एजेंसियों की कार्यशैली और न्याय प्रक्रिया की देरी दोनों पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

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