मध्य प्रदेश के 1.5 लाख शिक्षकों पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, टीईटी पास करना अब अनिवार्य

मध्य प्रदेश समेत पूरे देश के सरकारी शिक्षकों के लिए सुप्रीम कोर्ट का एक महत्वपूर्ण फैसला सामने आया है। इस निर्णय का सबसे बड़ा प्रभाव मध्य प्रदेश के करीब 1.5 लाख शिक्षकों पर पड़ने वाला है। सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया है कि बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराना संविधान की प्राथमिक जिम्मेदारी है और इसके लिए शिक्षकों का योग्य होना आवश्यक है। इसी वजह से शिक्षक पात्रता परीक्षा यानी टीईटी को सभी सेवारत शिक्षकों के लिए अनिवार्य माना गया है। हालांकि अदालत ने शिक्षकों की व्यावहारिक कठिनाइयों और वर्तमान परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए राहत भी दी है। कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत विशेष अधिकारों का उपयोग करते हुए टीईटी पास करने की समय सीमा एक वर्ष बढ़ा दी है। इससे मध्य प्रदेश के हजारों शिक्षकों को तैयारी के लिए अतिरिक्त समय मिल गया है।

बच्चों की शिक्षा सर्वोपरि, गुणवत्ता से समझौता नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि शिक्षा का अधिकार कानून पूरी तरह बच्चों के हितों को केंद्र में रखकर बनाया गया है। अदालत का मानना है कि किसी भी शिक्षक की सेवा बच्चों की शिक्षा की गुणवत्ता से ऊपर नहीं हो सकती। कोर्ट ने साफ कहा कि टीईटी केवल एक औपचारिक परीक्षा नहीं बल्कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करने का माध्यम है। न्यायालय ने यह भी माना कि शिक्षक ही किसी बच्चे के भविष्य की नींव तैयार करते हैं। इसलिए उनके पास आवश्यक शैक्षणिक योग्यता होना अनिवार्य है। अदालत की टिप्पणी से स्पष्ट संकेत मिला है कि सरकार और शिक्षा विभाग अब शिक्षकों की योग्यता को लेकर किसी प्रकार की ढील देने के पक्ष में नहीं हैं। इस फैसले को शिक्षा व्यवस्था में सुधार की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

मध्य प्रदेश के शिक्षकों को मिली बड़ी राहत, बढ़ी समय सीमा

पहले सुप्रीम कोर्ट ने टीईटी योग्यता प्राप्त करने के लिए दो वर्ष की समय सीमा तय की थी। इसके अनुसार शिक्षकों को 31 अगस्त 2027 तक परीक्षा पास करनी थी। लेकिन अब अदालत ने इसे बढ़ाकर 31 अगस्त 2028 कर दिया है। इसका मतलब है कि मध्य प्रदेश के वे शिक्षक जो अभी तक टीईटी पास नहीं कर पाए हैं उन्हें एक अतिरिक्त वर्ष का समय मिलेगा। कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया है कि राज्यों को हर साल कम से कम दो बार टीईटी परीक्षा आयोजित करनी चाहिए ताकि शिक्षकों को पर्याप्त अवसर मिल सकें। परीक्षाओं के बीच लगभग छह महीने का अंतर रखने की सलाह भी दी गई है। इससे मध्य प्रदेश के शिक्षकों को तैयारी करने और योग्यता प्राप्त करने का बेहतर मौका मिलेगा।

शिक्षक संगठनों की नाराजगी और आगे की रणनीति

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद मध्य प्रदेश के शिक्षक संगठनों ने अपनी चिंता भी जाहिर की है। उनका कहना है कि जो शिक्षक शिक्षा का अधिकार कानून लागू होने से पहले नियुक्त हुए थे उन्हें टीईटी की अनिवार्यता से छूट मिलनी चाहिए। मध्य प्रदेश शासकीय शिक्षक संगठन का तर्क है कि वर्षों से सेवा दे रहे अनुभवी शिक्षकों को नई पात्रता परीक्षा के दायरे में लाना उचित नहीं है। संगठन ने केंद्र सरकार से आरटीई कानून में संशोधन करने की मांग उठाई है ताकि पुराने शिक्षकों को राहत मिल सके। साथ ही चेतावनी दी गई है कि यदि सरकार ने इस दिशा में कोई सकारात्मक कदम नहीं उठाया तो शिक्षक संगठन आंदोलन का रास्ता भी अपना सकते हैं। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि 31 अगस्त 2028 के बाद समय सीमा बढ़ाने की कोई मांग स्वीकार नहीं की जाएगी। ऐसे में मध्य प्रदेश के शिक्षकों के लिए यह अंतिम अवसर माना जा रहा है।

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