कौन हैं ऋतब्रत बनर्जी जिसने ममता की राजनीति को हिला दिया बड़ा खुलासा

पश्चिम बंगाल की राजनीति एक बार फिर बड़े राजनीतिक संकट के दौर में पहुंच गई है। लगातार 15 साल तक राज्य की सत्ता पर मजबूत पकड़ रखने वाली मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इस समय अपनी ही पार्टी के भीतर बढ़ती बगावत का सामना कर रही हैं। तृणमूल कांग्रेस (TMC) में अंदरूनी असंतोष तेजी से बढ़ता दिख रहा है और कई अहम नेता पार्टी से दूरी बनाते जा रहे हैं। इसी राजनीतिक उथल-पुथल के बीच एक बड़ा घटनाक्रम सामने आया जब हाल ही में निष्कासित विधायक ऋतब्रत बनर्जी ने 58 विधायकों के समर्थन का दावा करते हुए विपक्ष के नेता की स्थिति पर अपना दावा पेश कर दिया। इस घटनाक्रम ने राज्य की राजनीति में हलचल पैदा कर दी है और ममता बनर्जी के लिए यह अब तक की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक मानी जा रही है।

कौन हैं ऋतब्रत बनर्जी और कैसे बढ़ा उनका राजनीतिक कद

ऋतब्रत बनर्जी की राजनीतिक यात्रा काफी दिलचस्प रही है। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत वामपंथी पार्टी CPI(M) से जुड़कर छात्र राजनीति से की थी। कोलकाता के प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थानों से पढ़ाई करने वाले ऋतब्रत साल 2000 के आसपास छात्र संगठन SFI के अखिल भारतीय महासचिव बने और जल्द ही वाम राजनीति में एक उभरते हुए चेहरे के रूप में पहचान बनाने लगे। सीताराम येचुरी के करीबी माने जाने वाले ऋतब्रत ने तेजी से राजनीतिक ऊंचाइयां हासिल कीं और महज 34 साल की उम्र में 2014 में राज्यसभा सांसद बन गए। हालांकि 2017 में उन्हें पार्टी विरोधी गतिविधियों और जीवनशैली को लेकर CPI(M) से निष्कासित कर दिया गया, जिसके बाद उनकी राजनीतिक दिशा बदल गई।

TMC में एंट्री और फिर बढ़ता विवादों का सिलसिला

CPI(M) से बाहर होने के बाद ऋतब्रत बनर्जी ने 2018 में तृणमूल कांग्रेस का दामन थामा और ममता बनर्जी को वाम राजनीति का असली चेहरा बताते हुए समर्थन किया। पार्टी में शामिल होने के बाद उन्हें ट्रेड यूनियन शाखा की जिम्मेदारी दी गई और धीरे धीरे उनका राजनीतिक कद फिर से बढ़ने लगा। 2024 में उन्हें राज्यसभा में भी स्थान मिला और बाद में विधानसभा चुनावों में उन्होंने उलुबेरिया पुरबा से जीत हासिल की। हालांकि इसके बाद उनका नाम एक विवादित मुलाकात और पार्टी नेतृत्व से मतभेदों को लेकर चर्चा में आने लगा। 2026 के चुनावों के बाद उनकी राजनीतिक गतिविधियां और अधिक संदिग्ध मानी जाने लगीं, जिससे पार्टी के भीतर तनाव बढ़ता चला गया।

निष्कासन के बाद 58 विधायकों के साथ नया राजनीतिक दावा

1 जून को तृणमूल कांग्रेस ने ऋतब्रत बनर्जी और एक अन्य नेता संदीपन साहा को पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में निष्कासित कर दिया। इसके बाद स्थिति तब और गंभीर हो गई जब ऋतब्रत बनर्जी ने विधानसभा में 58 विधायकों के समर्थन का दावा करते हुए विपक्ष के नेता (LoP) की मांग रख दी। स्पीकर द्वारा उनके दावे को मान्यता मिलने के बाद राजनीतिक समीकरण पूरी तरह बदल गए। इस घटनाक्रम ने ममता बनर्जी के नेतृत्व पर सवाल खड़े कर दिए हैं और पार्टी में टूट की आशंका को और गहरा कर दिया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह घटनाक्रम टीएमसी के लिए एक बड़ा संगठनात्मक संकट साबित हो सकता है।

ममता बनर्जी के सामने सबसे बड़ी संगठनात्मक चुनौती

इस पूरे घटनाक्रम ने पश्चिम बंगाल की राजनीति को पूरी तरह हिला दिया है। जहां एक ओर ममता बनर्जी अपने संगठन को मजबूत बनाए रखने की कोशिश कर रही हैं, वहीं दूसरी ओर पार्टी के भीतर बढ़ता असंतोष उनकी मुश्किलें बढ़ा रहा है। विपक्षी दल इस स्थिति को टीएमसी की कमजोरी के रूप में देख रहे हैं और इसे आने वाले समय में बड़ा राजनीतिक बदलाव मान रहे हैं। ऋतब्रत बनर्जी का यह कदम न केवल पार्टी के लिए चुनौती है बल्कि बंगाल की सत्ता समीकरणों पर भी असर डाल सकता है। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि क्या ममता बनर्जी इस राजनीतिक संकट से उबर पाती हैं या यह विवाद उनकी पार्टी के लिए और बड़े संकट का रूप ले लेता है।

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