परिसीमन बिल पर फिर मची हलचल, बदल सकते हैं देश के राजनीतिक समीकरण

देश की राजनीति में एक बार फिर परिसीमन बिल को लेकर हलचल तेज हो गई है। असम और पश्चिम बंगाल में हालिया राजनीतिक सफलता के बाद केंद्र सरकार अब इस महत्वपूर्ण विधेयक को दोबारा संसद में लाने की तैयारी कर रही है। सूत्रों के अनुसार गृह मंत्रालय नए प्रारूप के साथ परिसीमन बिल पेश करने पर विचार कर रहा है। सरकार की कोशिश है कि वर्ष 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले न केवल परिसीमन बिल बल्कि ‘एक देश एक चुनाव’ जैसे महत्वाकांक्षी प्रस्तावों को भी संसद की मंजूरी मिल जाए। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि यह बिल पारित होता है तो देश की चुनावी और संसदीय राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। यही कारण है कि इस मुद्दे ने एक बार फिर राष्ट्रीय राजनीति का तापमान बढ़ा दिया है।

बदले राजनीतिक समीकरणों पर सरकार की नजर

पिछली बार जब परिसीमन बिल संसद में पेश किया गया था तब सरकार को अपेक्षित समर्थन नहीं मिल पाया था। लेकिन अब कई राज्यों में राजनीतिक समीकरण बदल चुके हैं। खबर है कि दक्षिण भारत की राजनीति में आए बदलावों और कुछ क्षेत्रीय दलों की बदलती रणनीतियों पर केंद्र सरकार की पैनी नजर है। तमिलनाडु की राजनीति में हुए घटनाक्रमों के बाद कई नए समीकरण बनने की चर्चा है। इसी के साथ पश्चिम बंगाल में भी राजनीतिक हलचल को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यदि कुछ क्षेत्रीय दलों का समर्थन सरकार को मिलता है तो इस बार बिल के पारित होने की संभावनाएं पहले की तुलना में मजबूत हो सकती हैं। यही वजह है कि केंद्र सरकार विभिन्न दलों के साथ संवाद बढ़ाने की रणनीति पर काम करती दिखाई दे रही है।

पिछली बार क्यों नहीं पास हो पाया था बिल

परिसीमन बिल को पारित कराने के लिए संसद में विशेष बहुमत की आवश्यकता होती है। पिछली बार जब यह प्रस्ताव लोकसभा में आया था तब सरकार को दो-तिहाई बहुमत यानी 362 मतों की जरूरत थी। हालांकि बिल के समर्थन में केवल 298 वोट ही मिल सके थे जबकि 230 सांसदों ने इसके विरोध में मतदान किया था। आवश्यक संख्या नहीं मिलने के कारण यह महत्वपूर्ण विधेयक पारित नहीं हो पाया था। उस समय विपक्ष ने प्रतिनिधित्व और राज्यों के हितों से जुड़े कई सवाल उठाए थे। अब सरकार बदले राजनीतिक माहौल में फिर से समर्थन जुटाने की कोशिश कर रही है। माना जा रहा है कि इस बार बिल को अधिक व्यापक राजनीतिक सहमति के साथ आगे बढ़ाने का प्रयास किया जाएगा ताकि पिछली बार जैसी स्थिति दोबारा न बने।

विपक्ष की आपत्तियां और आगे की चुनौती

केंद्र सरकार की संभावित पहल के बीच विपक्ष भी सक्रिय हो गया है। कांग्रेस समेत कई विपक्षी दलों का कहना है कि परिसीमन जैसे संवेदनशील मुद्दे पर व्यापक चर्चा और सभी पक्षों से परामर्श जरूरी है। कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने कहा है कि इस विषय पर अभी तक कोई औपचारिक संवाद नहीं हुआ है और देश को इस मुद्दे पर गंभीर बहस की आवश्यकता है। उनका कहना है कि लोकसभा में प्रतिनिधित्व तय करते समय केवल जनसंख्या ही नहीं बल्कि राज्यों के हितों और संघीय ढांचे का भी ध्यान रखा जाना चाहिए। ऐसे में यह साफ है कि परिसीमन बिल केवल एक कानूनी या प्रशासनिक प्रस्ताव नहीं बल्कि आने वाले वर्षों की राजनीति को प्रभावित करने वाला बड़ा मुद्दा बन सकता है। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि सरकार संसद में इसे कब और किस रणनीति के साथ पेश करती है।

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