दिल्ली। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के दौर में डीपफेक तकनीक एक बड़ी चुनौती बनकर उभरी है। फर्जी वीडियो, ऑडियो और तस्वीरों के जरिए लोगों को भ्रमित करने तथा उनकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। ऐसे समय में “वास्तविक” (Vastavik) नामक प्लेटफॉर्म डिजिटल कंटेंट की प्रामाणिकता साबित करने का एक नया समाधान लेकर आया है।
संस्कृत शब्द “वास्तविक” का अर्थ है सच्चा, असली और प्रामाणिक। इसी सोच के साथ विकसित यह प्लेटफॉर्म लोगों को यह पहचानने में मदद करता है कि कोई वीडियो, फोटो या ऑडियो वास्तव में असली है या नहीं। इसका उद्देश्य डीपफेक और भ्रामक सामग्री से लोगों को बचाना तथा विश्वसनीय जानकारी को बढ़ावा देना है।
यह बात वास्तविक के संस्थापक गजेंद्र सिंह ने दिल्ली प्रेस क्लब में पत्रकारों को संबोधित देते हुए बताई।
वास्तविक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह लोगों की सोच को बदलने का प्रयास करता है। अब सवाल यह नहीं होना चाहिए कि “क्या यह फर्जी है?”बल्कि यह होना चाहिए कि “क्या यह सत्यापित है?” प्लेटफॉर्म उपयोगकर्ताओं को अपनी सामग्री को प्रमाणित करने का अवसर देता है, जिससे कोई भी व्यक्ति स्पष्ट रूप से कह सकता है कि यदि कोई कंटेंट वास्तविक पर सत्यापित नहीं है, तो उसे उसकी आधिकारिक या प्रामाणिक सामग्री न माना जाए।
यह मंच विशेष रूप से राजनेताओं, पत्रकारों, सोशल मीडिया क्रिएटर्स, संस्थानों और सार्वजनिक हस्तियों के लिए उपयोगी है, जिनकी तस्वीरों, वीडियो या ऑडियो का दुरुपयोग कर डीपफेक तैयार किए जा सकते हैं।
तकनीकी रूप से वास्तविक हाइपरलेजर फैब्रिक ब्लॉकचेन और NFT आधारित तकनीक का उपयोग करता है। एक बार किसी मीडिया सामग्री को ब्लॉकचेन पर दर्ज कर दिया जाए, तो उसके अस्तित्व और प्रामाणिकता को चुनौती नहीं दी जा सकती। उपयोगकर्ता अपनी सामग्री को निजी या सार्वजनिक NFT के रूप में पंजीकृत कर सकते हैं।
डिजिटल युग में जहां फर्जी और असली सामग्री के बीच अंतर करना कठिन होता जा रहा है, वहीं “वास्तविक” एक भरोसेमंद सत्यापन मंच के रूप में उभर रहा है। यह न केवल डीपफेक के खतरे से बचाव का माध्यम है, बल्कि डिजिटल दुनिया में विश्वास और पारदर्शिता को मजबूत करने की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम है।


