MP News: हेमंत खंडेलवाल के नेतृत्व में भी भाजपा गुटबाजी पर नहीं लगा विराम

MP News: मध्य प्रदेश में भाजपा सरकार भले ही लगातार चुनावी सफलताओं के साथ सत्ता में बनी हुई हो, लेकिन संगठन के भीतर गहराती गुटबाजी अब एक बड़ी चुनौती बनती जा रही है। पार्टी पर लंबे समय से विपक्ष को गुटों में बंटा हुआ बताने का आरोप लगाने वाली भाजपा खुद आज आंतरिक गुटबाजी से जूझती नजर आ रही है। प्रदेश में नेतृत्व परिवर्तन और नए प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल की नियुक्ति के बावजूद संगठनात्मक एकता बहाल नहीं हो पाई है। हालात ऐसे हैं कि कई अहम फैसलों पर आम सहमति बनाना भी मुश्किल हो गया है, जिससे पार्टी के भीतर असंतोष की स्थिति साफ झलक रही है।

संगठनात्मक नियुक्तियों में देरी से बढ़ा असंतोष और अनिश्चितता

प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद हेमंत खंडेलवाल ने तेजी से कार्यकारिणी का गठन तो किया, लेकिन इसके बाद गुटीय राजनीति और अधिक सक्रिय हो गई। दस प्रकोष्ठों और प्रदेश कार्यसमिति की घोषणा अब तक अधर में लटकी हुई है, जिससे संगठनात्मक ढांचा कमजोर दिख रहा है। वहीं एल्डरमैनों की नियुक्तियां भी अब तक पूरी नहीं हो पाई हैं और कई निकायों में पद खाली पड़े हैं। मुख्यमंत्री मोहन यादव के कार्यकाल को ढाई साल के करीब पहुंचने के बावजूद निगम और मंडलों की नियुक्तियां लंबित हैं। यह स्थिति न केवल संगठन की धीमी कार्यप्रणाली को दर्शाती है बल्कि सत्ता और संगठन के बीच समन्वय की कमी को भी उजागर करती है।

वरिष्ठ नेताओं और पीढ़ीगत बदलाव के बीच टकराव गहराया

भाजपा के भीतर एक और बड़ा मुद्दा वरिष्ठ नेताओं और नई पीढ़ी के बीच तालमेल की कमी का है। कैलाश विजयवर्गीय, प्रह्लाद पटेल, राकेश सिंह, भूपेन्द्र सिंह, गोपाल भार्गव, विजय शाह और फग्गन सिंह कुलस्ते जैसे वरिष्ठ नेता लंबे समय से संगठन की रीढ़ माने जाते रहे हैं। लेकिन मौजूदा परिस्थितियों में ये नेता और नई नेतृत्व पीढ़ी के बीच दूरी बढ़ती दिख रही है। पार्टी में पीढ़ी परिवर्तन की प्रक्रिया शुरू तो हुई है, लेकिन वरिष्ठ नेता अपनी भूमिका छोड़ने को तैयार नहीं दिख रहे हैं। इससे संगठन के भीतर असंतुलन की स्थिति पैदा हो रही है और कई स्तरों पर निर्णय प्रक्रिया प्रभावित हो रही है।

बैठकों के बावजूद समाधान नहीं, कार्यकर्ताओं में भी घटा उत्साह

भोपाल से दिल्ली तक लगातार संगठन, सरकार और संघ के बीच समन्वय बैठकों का दौर जारी है, लेकिन अब तक कोई ठोस परिणाम सामने नहीं आया है। हाल ही में हुई तीन प्रमुख समन्वय बैठकें भी किसी निष्कर्ष तक नहीं पहुंच सकीं। प्रदेश कार्यालय में कार्यकर्ता तो पहुंचते हैं, लेकिन उनमें पहले जैसा उत्साह दिखाई नहीं देता। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष ने कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने के लिए प्रवास और संवाद कार्यक्रम शुरू किए हैं, लेकिन इसका प्रभाव सीमित ही रहा है। वहीं सरकार के स्तर पर सांसदों और विधायकों को जनता से जुड़ने के निर्देश दिए गए हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर इसका असर बहुत कम दिखाई दे रहा है।

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