MP News: बुंदेलखंड की पारंपरिक युद्ध कला और शौर्य के वैश्विक प्रतीक भगवानदास रैकवार ‘दाऊ’ अब हमारे बीच नहीं रहे। 83 वर्ष की उम्र में उन्होंने भोपाल के एक निजी अस्पताल में अंतिम सांस ली। दुखद पहलू यह रहा कि इसी वर्ष उन्हें पद्मश्री सम्मान की घोषणा हुई थी, जिसे वे ग्रहण भी नहीं कर पाए। उनके निधन से पूरे क्षेत्र में गहरा शोक फैल गया है।
साधारण परिवार से वैश्विक पहचान तक का सफर
2 जनवरी 1944 को सागर में जन्मे भगवानदास रैकवार का जीवन संघर्षों से भरा रहा। एक साधारण परिवार में जन्म लेकर उन्होंने अपनी मेहनत और समर्पण से पहचान बनाई। प्रारंभिक शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने स्टेट बैंक में नौकरी की, लेकिन अपने भीतर छिपी कला और परंपरा के प्रति समर्पण ने उन्हें एक अलग राह पर मोड़ दिया।
नौकरी छोड़कर समर्पित कर दी जीवन भर की साधना
1964 में उन्होंने सरकारी नौकरी छोड़कर बुंदेली मार्शल आर्ट को पुनर्जीवित करने का संकल्प लिया। अपने गुरु राम चरण रावत के मार्गदर्शन में उन्होंने छत्रसाल अखाड़े की कमान संभाली और तलवार, लाठी, भाला और त्रिशूल जैसी युद्ध कलाओं को नई पहचान दिलाई। उनका मानना था कि यह कला केवल युद्ध नहीं बल्कि आत्मरक्षा और संस्कारों का माध्यम है।
देश-विदेश में फैलाया भारतीय शौर्य का परचम
दाऊ भगवानदास रैकवार ने न केवल भारत में बल्कि रूस, अमेरिका और सिंगापुर जैसे देशों में भी भारतीय युद्ध कला का प्रदर्शन किया। उन्होंने 20 हजार से अधिक विद्यार्थियों को प्रशिक्षण दिया और हजारों मंचों पर अपनी कला का प्रदर्शन किया। वे मानते थे कि एक प्रशिक्षित व्यक्ति कई लोगों का सामना कर सकता है। लंबे समय से बीमारी से जूझ रहे दाऊ ने अंततः इस दुनिया को अलविदा कह दिया, लेकिन उनकी विरासत आज भी जीवित है।


