मध्य प्रदेश राज्यसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने तीसरी सीट के लिए महेश केवट को उम्मीदवार बनाकर राजनीतिक गलियारों में हलचल बढ़ा दी है। विधानसभा के मौजूदा आंकड़े बीजेपी के लिए आसान जीत का संकेत नहीं देते, फिर भी पार्टी का यह कदम बताता है कि चुनावी गणित से परे रणनीति और राजनीतिक प्रबंधन भी बड़ी भूमिका निभाने वाले हैं।
तीसरी सीट पर क्यों फंसा है मामला?
राज्यसभा चुनाव में जीत के लिए एक उम्मीदवार को 58 वोटों की आवश्यकता है। विधानसभा की वर्तमान स्थिति में बीजेपी के पास 164 विधायक हैं, जबकि कांग्रेस के पास 64 विधायक हैं। इस आधार पर बीजेपी दो सीटें आसानी से जीत सकती है, लेकिन तीसरी सीट के लिए उसके पास आवश्यक संख्या से कम वोट हैं।
दो उम्मीदवारों को जिताने के बाद बीजेपी के पास लगभग 48 वोट बचते हैं, जबकि तीसरी सीट के लिए 58 वोट चाहिए। यानी पार्टी को कम से कम 10 अतिरिक्त वोटों की जरूरत होगी।
कांग्रेस भी पूरी तरह सतर्क
बीजेपी की रणनीति के बाद कांग्रेस ने भी अपने विधायकों को एकजुट रखने की कवायद तेज कर दी है। पार्टी को आशंका है कि मतदान के दौरान क्रॉस-वोटिंग समीकरण बदल सकती है। इसी वजह से विधायकों की बाड़ाबंदी को लेकर चर्चाएं तेज हैं।
कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में मीनाक्षी नटराजन मैदान में हैं और पार्टी हर वोट को सुरक्षित रखने की कोशिश कर रही है।
क्या बन सकते हैं नए समीकरण?
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि तीसरी सीट का परिणाम केवल संख्या बल से तय नहीं होगा। निर्दलीय समर्थन, छोटे दलों का रुख और संभावित क्रॉस-वोटिंग चुनाव का रुख बदल सकती है।
यही कारण है कि बीजेपी ने जोखिम उठाते हुए तीसरा उम्मीदवार मैदान में उतारा है। पार्टी को भरोसा है कि मतदान के समय कुछ अतिरिक्त समर्थन मिल सकता है।
कौन हैं महेश केवट?
महेश केवट मध्य प्रदेश के निवाड़ी जिले के ओरछा क्षेत्र से आते हैं। वे वर्तमान में मछुआरा कल्याण बोर्ड के अध्यक्ष हैं और लंबे समय से बीजेपी संगठन में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। जिला स्तर से लेकर राष्ट्रीय कार्यकारिणी तक उन्होंने संगठनात्मक जिम्मेदारियां निभाई हैं।


