AI के दौर में ‘HI’ की जरूरत! धीरेंद्र शास्त्री ने दिया नया मंत्र, बताया क्या है हिंदुत्व इंटेलिजेंस

Author Picture
By Input Published On: June 8, 2026
AI के दौर में ‘HI’ की जरूरत! धीरेंद्र शास्त्री ने दिया नया मंत्र, बताया क्या है हिंदुत्व इंटेलिजेंस

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की चर्चा आज पूरी दुनिया में हो रही है, लेकिन छतरपुर में बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने एक नया शब्द सामने रखकर बहस छेड़ दी। उन्होंने कहा कि भारत को केवल AI नहीं, बल्कि HI यानी ‘हिंदुत्व इंटेलिजेंस’ की भी जरूरत है।
छतरपुर से दिया नया संदेश

अपने संबोधन के दौरान धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने कहा कि तकनीक का विकास जरूरी है, लेकिन समाज की आंतरिक मजबूती उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है। उनके अनुसार, यदि समाज संगठित, जागरूक और आत्मनिर्भर नहीं होगा, तो केवल तकनीकी प्रगति से समग्र विकास संभव नहीं हो सकेगा।

इसी संदर्भ में उन्होंने ‘HI’ यानी हिंदुत्व इंटेलिजेंस की अवधारणा को सामने रखा।

क्या है हिंदुत्व इंटेलिजेंस?

धीरेंद्र शास्त्री के अनुसार, हिंदुत्व इंटेलिजेंस का अर्थ किसी तकनीकी प्रणाली से नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक चेतना, संगठन और आत्मनिर्भरता से है। उन्होंने कहा कि इसका उद्देश्य हिंदू समाज को मजबूत, शिक्षित और आर्थिक रूप से सक्षम बनाना है।

उनका मानना है कि जब समाज का हर वर्ग एक-दूसरे के सहयोग के लिए आगे आएगा, तभी वास्तविक विकास की नींव मजबूत होगी।

उद्योगपतियों से की विशेष अपील

अपने संबोधन में उन्होंने देश के बड़े उद्योगपतियों और व्यापारिक संस्थानों से भी आग्रह किया कि वे युवाओं के लिए अधिक रोजगार के अवसर उपलब्ध कराएं। उनका कहना था कि बेरोजगारी किसी भी समाज की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है।

यदि युवाओं को रोजगार और अवसर मिलेंगे, तो वे आत्मनिर्भर बनेंगे और देश की अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलेगी।

सामाजिक समरसता पर दिया जोर

धीरेंद्र शास्त्री ने जातिगत भेदभाव को समाज की एक बड़ी कमजोरी बताते हुए इसे समाप्त करने की अपील की। उन्होंने कहा कि समाज में ऊंच-नीच और विभाजन की भावना को खत्म कर एकता और भाईचारे को बढ़ावा देना समय की मांग है।

उनके अनुसार, सामाजिक समरसता ही किसी भी मजबूत राष्ट्र की असली पहचान होती है।

क्यों चर्चा में है यह बयान?

AI के दौर में HI जैसे नए शब्द का इस्तेमाल करने के कारण यह बयान तेजी से चर्चा का विषय बन गया है। समर्थक इसे सामाजिक जागरूकता का संदेश मान रहे हैं, जबकि कई लोग इसे एक वैचारिक अवधारणा के रूप में देख रहे हैं।