सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में आरक्षण की सीमा 50 फीसदी से ज्यादा बढ़ाने की मांग,SC ने माँगा जबाब

Author Picture
By Sharma Published On: March 23, 2021

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण की सीमा 50 फीसदी से ज्यादा करने के मामले में राज्य सरकारों से जवाब मांगा है। महाराष्ट्र के मराठा समुदाय के आरक्षण मामले पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण की 50 फीसदी की तय सीमा में बदलाव को राज्यों से जबाब तलब किया है।

बता दें कि ज्यादातर राज्य सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में 50 फीसदी से ज्यादा आरक्षण की मांग कर रहे हैं। इनमें महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान, तमिलनाडु, झारखंड और कर्नाटक जैसे राज्य शामिल हैं, जो आरक्षण के दायरे को बढ़ाकर अपने राजनीतिक और सामाजिक समीकरण को मजबूत करना चाहते हैं।

बता दें कि साल 1992 में सुप्रीम कोर्ट ने इंदिरा साहनी मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए जाति-आधारित आरक्षण की अधिकतम सीमा 50 फीसदी तय कर दी थी। सुप्रीम कोर्ट के इसी फैसले के बाद कानून ही बन गया कि 50 फीसदी से ज्यादा आरक्षण नहीं दिया जा सकता। लेकिन अब फिर से कई राज्य 50 फीसदी से ज्यादा आरक्षण की मांग कर रहे हैंकर्नाटक की बीएस येदियुरप्पा सरकार ने आरक्षण के दायरे को बढ़ाया जाने का ऐलान किया है। कहा कि सरकार सुप्रीम कोर्ट में अपनी राय रखेगी। कर्नाटक में अनुसूचित जातियों के लिए 15 फीसदी, एसटी के लिए 3 फीसदी और अन्य पिछड़े वर्गों के लिए 32 फीसदी आरक्षण प्रदान किया जाता है, जो कुल मिलाकर 50 फीसदी होता है।

राजस्थान की अशोक गहलोत सरकार आरक्षण की सीमा 50 फीसदी से ज्यादा करने का ऐलान कर चुके हैं। लेकिन मामला अभी भी कोर्ट में रुका हुआ है। वहीं सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के बाद सरकार का ये मानना है कि आरक्षण की सीमा पर पुनर्विचार करना चाहिए और उसे बढ़ाए जाना चाहिए। राजस्थान में गुर्जर समुदाय लंबे समय से आरक्षण की मांग कर रहे हैं।

तमिलनाडु में पहले से 69 फीसदी आरक्षण दिया जा रहा है। इनमें रिजर्वेशन संबंधित कानून की धारा-4 के तहत 30 फीसदी रिजर्वेशन पिछड़ा वर्ग, 20 फीसदी अति पिछड़ा वर्ग, 18 फीसदी एससी और एक फीसदी एसटी के लिए रिजर्व किया गया है।

झारखंड की हेमंत सोरेन सरकार भी आरक्षण बढ़ाने को लेकर सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष रखेंगे। इसके पीछे असल वजह यह है कि झारखंड में काफी लंबे समय से ओबीसी समुदाय 14 फीसदी आरक्षण को बढ़ाकर 27 फीसदी करने की मांग कर रहा है, जिसे लेकर हेमंत सोरेन चुनाव में वादा भी कर चुके हैं। प्रदेश में अभी अनुसूचित जनजाति को 26 फीसदी, अनुसूचित जाति को 10 फीसदी, ओबीसी को 14 फीसदी और आर्थिक रूप से पिछड़ी सवर्ण जातियों को 10 फीसदी आरक्षण मिल रहा है। इस तरह से 60 फीसदी आरक्षण है।

महाराष्ट्र सरकार भी लंबे समय से 50 फीसदी से ज्यादा आरक्षण की मांग कर रहा है। राज्य सरकार ने 2018 में मराठा समुदाय को 16 फीसदी आरक्षण देने का फैसला किया था। सुप्रीम कोर्ट के तीन जजों की बेंच ने मराठा आरक्षण पर सुनवाई करते हुए इंदिरा साहनी केस या मंडल कमीशन केस का हवाला देते हुए इस पर रोक लगा दी। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले की सुनवाई के लिए बड़ी बेंच बनाए जाने की आवश्यकता है। मराठा आरक्षण के लिए पांच जजों की बेंच इस मामले की सुनवाई कर रही है।

तमिलनाडु की तरह केरल में भी विधानसभा चुनाव हो रहे हैं। जिसके चलते सरकार की ओर से सुनवाई टालने की अपील की गई है। सरकार कहना है कि चुनावों के कारण इस सुनवाई को टाल देना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि सरकार के पास अपना जवाब देने के लिए एक हफ्ते का वक्त है।