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आचार्य निर्भय सागर : पत्नी को नहीं करना चाहिए पति से पहले भोजन, जानिए क्यों

देश। वैज्ञानिक संत आचार्य निर्भय सागर (Acharya Nirbhay Sagar) महाराज ने कहा कि भोजन की थाली को लांघ कर नहीं जाना चाहिए। भोजन की थाली में लात मारकर अपमानित नहीं करना चाहिए। क्योकि ऐसा करने से दरिद्रता आती है। भोजन की थाली में बाल जीव, जंतु एवं पसीना आदि मल गिर गया हो, तो ऐसा भोजन नहीं करना चाहिए।

ऐसा भोजन करने से लोगों की वृद्धि होती है।

पत्नी को नहीं करना चाहिए पति के साथ भोजन  

आचार्य निर्भय सागर (Acharya Nirbhay Sagar) महाराज ने कहा पति और पत्नी को एक ही थाली में भोजन नहीं करना चाहिए, एक साथ भोजन करने से भोजन मादक हो जाता है। यदि पत्नी अपने पति के भोजन करने के बाद उसी थाली में भोजन करती है या पति का बचा हुआ भोजन करती है तो घर में धन की कमी नहीं होती है, और आपस में प्रेम वात्सल्य बढ़ता है। संत को आहार कराने के समान पुण्य का फल प्राप्त होता है। अगर दो भाई एक थाली में भोजन करते हैं तो वह अमृतपान के समान होता है। यदि कुमारी बेटी अपने पिता के साथ भोजन करती है तो उस पिता की शील संयम में वृद्धि होती है। संयम में वृद्धि होने से अकाल मृत्यु नहीं होती है। क्योकि संयम व्रत पिता की अकाल मृत्यु को हर लेती है।

इसीलिए बेटी जब तक कुमारी रहे तो अपने पिता के साथ बैठकर भोजन करें।

रामकथा में भय्यू जी महाराज ने कहा –

नईसराय कस्बे के प्रसिद्ध झिरिया सरकार हनुमान मंदिर पर चल रही रामकथा में भय्यू जी महाराज द्वारा तीसरे दिन माता पार्वती का वर्णन किया। उन्होंने कहा कि भगवान का नाम स्मरण करने से जीव के समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं और परमात्मा की कृपा से उसका मन निर्मल हो जाता है। जब माता सती ने भगवान राम पर संदेह किया और उनकी परीक्षा लेने के लिए माता सीता का रूप रखकर गई और जब भगवान ने उन्हें पहचान लिया और माता कह करके संबोधित किया।

तब माता सती से अप्रसन्न होकर भोलेनाथ ने उनका त्याग कर दिया।

 भोलेनाथ को दक्ष ने नहीं बुलाया यज्ञ में  

जब भोले बाबा को माता सती के पिता दक्ष प्रजापति ने अपने यज्ञ में न्यौता नहीं भेजा इसके बाद भी माता सती यज्ञ देखने के लिए पहुंची। जहां पर उन्होंने भोलेनाथ का भाग ना देखकर क्रोध किया और अपमान मानकर अपने आप को योग अग्नि में भस्म कर लिया। जब भोलेनाथ को इस बात का पता चला तो उन्होंने वीरभद्र को पहुंचाया और उसने यज्ञ में बहुत विध्वंस किया।  माता सती ने भगवान विष्णु से भोलेनाथ के चरणों में सदा प्रेम मांगा।

इसलिए वह अगले जन्म में पार्वती जी के रूप में प्रकट हुई।

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