सावन का पवित्र महीना भगवान शिव की आराधना के लिए समर्पित है। इस दौरान भक्तगण महादेव को प्रसन्न करने के लिए विभिन्न प्रकार के पुष्प अर्पित करते हैं, लेकिन एक फूल ऐसा भी है जिसे शिवलिंग पर चढ़ाना वर्जित माना गया है – वह है केतकी का फूल। इसके पीछे एक प्राचीन पौराणिक कथा छिपी है, जो शिवजी के क्रोध और एक श्राप से जुड़ी है।
ब्रह्माजी का असत्य और केतकी का समर्थन
पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार ब्रह्माजी और विष्णुजी में अपनी श्रेष्ठता को लेकर विवाद हुआ। तब एक विशाल ज्योतिर्लिंग प्रकट हुआ और यह घोषणा हुई कि जो इसके आदि और अंत का पता लगाएगा, वही श्रेष्ठ होगा। ब्रह्माजी ऊपर की ओर गए और अंत न मिलने पर भी वापस आकर झूठ कहा कि उन्होंने अंत ढूंढ लिया है। इस असत्य का साक्षी उन्होंने केतकी के फूल को बनाया।
भगवान शिव का श्राप
भगवान शिव को ब्रह्माजी के इस झूठ का ज्ञान हो गया। इस असत्य में केतकी के फूल के शामिल होने के कारण शिवजी अत्यंत क्रोधित हुए। उन्होंने ब्रह्माजी को श्राप दिया कि उनकी पूजा कभी नहीं होगी और केतकी के फूल को भी श्राप दिया कि उसे कभी भी शिव पूजा में शामिल नहीं किया जाएगा। यही कारण है कि आज भी शिवलिंग पर केतकी का फूल नहीं चढ़ाया जाता है।